भय ओर भयातुरता मे एक महीन अंतर होता है

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हमारे जीवन में डरना भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है हर चीज में हम अगर डर को खत्म कर देंगे तो यह हमारे पतन का कारण भी हो सकता है पर भय की अलग-अलग परिभाषाएं हैं जो हमारे जीवन में अलग-अलग स्थिति में अपना प्रभाव छोड़ती हैं.

भय या भयातुरता ..

भय ओर भयातुरता शब्द एक समान दिखाई पड़ते है किंतु इनमे एक महीन अंतर होता है भय कुछ समय के लिए होता है ओर यह सकारात्मक ओर नकरात्मक दोनो रूप मै हो सकता है किंतु भयातुरता सदैव नकरात्मकता का बोध ही कराती है ..

वाहन आदी सीमित गति मे चलाना एक सकारात्मक भय है जो हमारे जीवन के लिए अतिआवश्यक है किंतु वाहन चलाते समय ड़रना सामने गड़ड़ा है आगे खतरनाक मोड़ है रास्ते मै चोरी लूट हो सकती है तमाम तरह की दिक्कत है यह विचार का बार-बार आना भयातुरता है ..

भय साहस की तरह संक्रामक होता है किंतु भयातुरता संक्रामक नही होती है यह जरूरी नही जिससे हम ड़र रहे हो उससे आपके साथ वाले भी ड़रे..ओर वो भी भयातुरता महसूस करे.

माता पिता ओर धर्म शास्त्र

अपने परिजन माता पिता ओर धर्म शास्त्र के प्रति हमे सदैव सकारात्मक भय होता है जो कि जीवन उत्थान के लिए बहुत आवश्यक है, जिस प्रकार एक माँ का हाथ में डंडा लेने का उद्देश्य अपनी संतान को पीटना नहीं अपितु उसे थोडा सा भय दिखाकर गलत काम करने से रोकना होता है। ठीक इसी प्रकार हमारे शास्त्रों में भी दंड विधान का मतलव किसी को आतंकित करना अथवा भयभीत करना नहीं, थोडा सा भय दिखाकर मनुष्यों को कुमार्ग पर चलने से बचा लेना है।

धर्म शास्त्रों का काम डराना नहीं है , जीवन को अराजकता से बचाना है। शास्त्र पशु बने मनुष्यों के लिए उस चाबुक के समान है जो सही दिशा में जाने को बार- बार प्रेरित करता है। शास्त्रों का उद्देश्य भयभीत करना नहीं आपितु भयमुक्त कर देना है..

ओर यह सकारात्मक भय है ना कि भयातुरता-

Credit author – सचिन जैन