ये सच है कि मोदी ने राष्ट्रीयता को नई तरीके से परिभाषित किया है.

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जिन राष्ट्रवादियों ने 16 मई 2014 को मोदी में पृथ्वीराज चौहान की छवि देखि थी या जिन्हे उस दिन मोदी में हेगडेवार का ध्वज दिखा था , आज वे उतने ही निराश है जितने मोदी के अधिकाँश मंत्री और पार्टी के नेता. निराशा का कारण मोदी की निरंकुशता या अभिमान नहीं है बल्कि सरकार का वो स्कोरबोर्ड है जहाँ 50 ओवर में 400 रन बनाने का संकल्प लिया गया था पर 30 ओवर के बाद भी स्कोर 150 का आंकड़ा पार नहीं कर सका है. सरकार का एक भी ऐसा बड़ा प्रोजेक्ट नहीं है जो पांच साल में पूरा होते हुए हो दिख रहा हो. मेक इन इंडिया का हाल ये है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कोई 500 करोड़ का भी निवेश करने को तैयार नहीं है. एयरटेल, आईडिया, एयर सेल और वोडाफोन जैसी भारी भरकम कंपनियों में छंटनी हो रही है. जीएसटी ने छोटे दुकानदारों की कमर तोड़ दी है. नोटबंदी से जो एक लाख करोड़ की आमदनी होनी थी वो 16 हज़ार करोड़ के घाटे में तब्दील हो गयी. नितिन गडकरी के कुछ प्रोजेक्ट छोड़ दे तो इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर का बुरा हाल है. डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, स्टार्ट उप इंडिया, स्मार्ट सिटी जैसे प्रोजेक्ट फाइलों पर ज्यादा ज़मीन पर कम दिख रहे हैं. और ये सारी चुनौतियाँ उस वक़्त मुँह बाये खड़ी हैं जब 20 ओवर भी नहीं बचे हैं.

ये सच है कि मोदी ने राष्ट्रीयता को नई तरीके से परिभाषित किया है.

ये सच है कि मोदी ने राष्ट्रीयता को नई तरीके से परिभाषित किया है. लेकिन सच ये भी कि राष्ट्र सिर्फ नारों के बल पर कब तक आगे बढ़ेगा. अगर कॉर्पोरेट न्यूज़ चैनल के पेड सर्वे दरकिनार कर दिये जाएँ तो देश का असली मूड अब धीरे धीरे कुछ और ही संकेत देने लगा है. इस मूड को भांपने के लिए हमे किसी सर्वे की नहीं खुद को आंकने की ज़रुरत है. शायद दो- तीन साल के शुरुआती उत्साह के बाद आखिरकार हम और आप अब ये सोचने पर मज़बूर हुए हैं कि ….मेरे घर और आसपास आखिर बदला क्या है? हमने आखिर हासिल क्या किया है ? समाज या देश में वाकई क्या फर्क आया है ? क्या हम वाकई छलांग लगाकर आगे बढ़ गए ….क्यूंकि दीवार पर लिखे गए नारे तो कुछ यूँ ही बयां कर रहे थे ….कि विकास सबका होगा ..आगे सब बढ़ेंगे. लेकिन सच यही है कि आँखों के सामने सिर्फ एक चायवाले की चौंका देने वाली छलांग हमे अब तक नज़र आयी है.