15 अगस्त 1947 का अखबार- शताब्दियों की दासता के बाद भारत में स्वतंत्रता की मंगल प्रभात

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।।पराधीन सपनेहुँ सुख नाही।।

वस्तु के आधीन पराधीन, व्यक्ति के आधीन पराधीन,
अवस्था के आधीन पराधीन, परिस्थिति के आधीन पराधीन।

‘पर’ के द्वारा ‘स्व’ का बोध न किसी को हुआ है और न होगा।

15 अगस्त 1947 का अखबार- शताब्दियों की दासता के बाद भारत में स्वतंत्रता की मंगल प्रभात

यह उस नई सुबह की शुरुआत थी 1947 का अखबार- शताब्दियों की दासता के बाद भारत में स्वतंत्रता की मंगल प्रभात जब अंग्रेजों ने हमें हमारी आजादी वापस की थी इस आजादी के लिए हमारे देश के लाखों लोगों ने अपना बलिदान देकर इस आजादी को हमें एक तोहफे के रुप में दिया था शायद आज हम इस आजादी की पराकाष्ठा को नहीं समझ रहे हो पर यह आजादी हमें पाने के लिए कई प्राणों का बलिदान दिया है.  इसमें हमारे गरीब भारत के वह सुनहरे सपने शामिल थे जो हर भारतीय आजादी की सुबह को देख रहा था. 

पराधीन प्राणी के जीवन में न तो उदारता ही आती है,
और न प्रेम ही की अभिव्यक्ति होती है ।
इस कारण पराधीनता का नाश करना अनिवार्य है।
जो एक मात्र निष्कामता से ही साध्य है।

-वर्तमान मानव जीवन उस कबूतर कि तरह है, जो दिन भर स्वतंत्रता पूर्वक खुले गगन में भ्रमण करता है, किन्तु शाम होते ही अपने घर लौट आता है, अर्थात स्वयं बध्यता प्रेमी है !
आत्म कल्याण करने के लिए मानव जीवन तो उस तोते के समान होना चाहिए, जिसे लाख सोने के पिंजरे में रखा जाए, किन्तु वह सदा उससे निकलकर भागने की कामना करता है !

**15 अगस्त 1947 का अखबार**

15 अगस्त 1947 का अखबार
15 अगस्त 1947 का अखबार- पराधीन सपनेहुँ सुख नाही