Apne Dil ke Darwajo ko kholkar to dekho shayri

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Apne dil ke darwajo ko kholkar to dekho-Shayri

अपने दिल के दरवाजों को खोलकर देखो,
जुबाँ में अपनी मिठास को घोलकर देखो।
ज़माना पलकें बिछा देगा तुम्हारे कदमों में,
यहाँ हर किसी को प्यार से बोलकर देखो।

गैरों में अपनों को तलाशना छोड़कर देखो,
टूटे हुए रिश्तों को फिर से जोड़कर देखो।
महफिलें फिर से सजने लगेंगी घर घर में,
अपने अहंकार की दीवार तोड़कर देखो।

बड़े बुजुर्गों के संस्कार अपनाकर देखो,
अपनी संस्कृति को गले लगाकर देखो।
नहीं होगी नीलाम इज्जत माँ बहनों की,
आँखों में अपनी तुम शर्म बचाकर देखो।

अपना ये पश्चिम का मोह मार कर देखो,
फैशन का ये चश्मा तुम उतार कर देखो।
दुनिया अपना रही है हमारी सभ्यता को,
ऐसा क्या है इसमें, सोच विचार कर देखो।

नैतिक मूल्यों के पतन के नुकसान देखो,
नीचता की हदें पार करता इंसान देखो।
कर रही है आगाह ” राजु ” हर रोज,
बिना नैतिकता के बन रहा हैवान देखो।



Uska mera ajnabi ka rista hi rha- Shayri

उसका मेरा अजनबी का रिश्ता ही रहा
मैं मंजिल न बना, उम्र भर रस्ता ही रहा

इतने आंसू न दिए ज़िन्दगी ने मुझे
हार कर मैं अपने ग़मों पे हँसता ही रहा

उसने कोई और ज़मी की ख्वाहिश न करी
वो जो बादल था मेरी छत पे बरसता ही रहा

कौन करता है किसी और की तमन्ना पूरी
मैं नवाकिफ था चिरागों को घिसता ही रहा

हम समझते थे जिसको कि वो खुश है हमसे
वो किसी और की हसरत मैं तरसता ही रहा

ज़ख्म सारे जो मिले भर ही चले हैं अब तो
एक उसका ही ज़ख्म बाद तक रिसता ही रहा



Jadu bhari Nigha se wo arj kar gye – Shayri

जादू भरी निगाह से वो अर्ज़ कर गये
करके बीमार लाइलाज़ मर्ज़ कर गये।

खंज़र चला न तीर औ क़त्ल हो गये
इल्ज़ाम न लगे कोई वो तर्ज़ कर गये।

नजरों के वार में रखा शमशीर था मगर
गरदन झुकाई और अदा फ़र्ज़ कर गये।

ठहरा हुआ था आब भी अपनी हयात में
वो फेंक गये कंकड़ी फिर सर्ज़ कर गये।

नजरें ये चाहतीं हैं कि वो सामने रहे
शौके दीदार का हमें खुदगर्ज़ कर गये।

मुमकीन नहीं रिहाई है उनके निज़ाम में
इल्ज़ाम लगा कितनी दफ़ा दर्ज़ कर गये।