प्रतिस्पर्धा या प्रतिद्वंदिता, Motivational Speech, Competition or rivalry in Hindi

Sachin Jain

प्रतिस्पर्धा या प्रतिद्वंदिता 

मानव अपना विकास करना चाहता है ओर यह विकास की बानगी मै मानव व्यवसाय या रोजगार करता है ओर उस रोजगार से अपना जीवन यापन करता है इस कार्य मै उसे बहुतेरे को पीछे छोङना पङता है ओर सामान्यतः इसके दो तरीके है या तो उससे अधिक प्रगति कर अपनी रेखा बङी कर या फिर उसे अन्य तरीके से हतोत्साहित कर.. बस यही अंतर “प्रतिस्पर्धा” ओर “प्रतिद्वंदिता” मै है..

Motivational speech in hindi

एक धावक बहुत तेज दोङ कर भी दोङ जीत सकता है या साथ चलने वाले को धक्का मार कर या अन्य तरीके से बाधित करके भी दोङ जीत सकता है अब सवाल यह है कि कोन सा तरीका बेहतर है पहला या दूसरा निश्चित है प्रथम तरीका सर्वोत्तम है कयोंकि यह किसी के क्षोभ का कारण नही बनता ओर जीतने वाले को भी संतोष बना रहता है..

“प्रतिस्पर्धा”बहुत बेहतरीन साधन है मानव उत्थान के लिए किंतु “प्रतिद्वंदिता” उतनी ही गलत प्रतिद्वंदी सदैव प्रतिस्पर्धी हो सकता है किन्तु प्रतिस्पर्धी सदैव प्रतिद्वंदी हो यह जरूरी नही प्रतिस्पर्धा मानव का मूल स्वभाव है प्रतिद्वंदिता एक अवगुण है..प्रतिस्पर्धा विकास का पर्याय है ओर प्रतिद्वंदिता सदैव विनाश ही प्रायोजित करता है..

प्रतिस्पर्धा या प्रतिद्वंदिता
प्रतिस्पर्धा या प्रतिद्वंदिता

,प्रतिस्पर्धा जहाँ मछलियों का एक दुसरे से आगे तैर कर निकल जाने वाला स्वभाव है वहीं प्रतिद्वंदी केकड़े की टांग खींचने की आदत है | प्रतिस्पर्धा जहाँ लोगों को आगे ले जाती है वहीं प्रतिद्वंदिता पूरे समाज को पीछे खींच ले जाती है |

विचारे इस जीवनकाल मै हम क्या कर रहै है प्रतिस्पर्धा या प्रतिद्वंदिता ओर उससे हमे क्या हानि लाभ हो रहा है .. सदैव स्मरणीय रहे कि प्रतिस्पर्धी क्रोध का बिषय नही है वो तो सदैव हमारे लिए शोध का बिषय है..
Sachin Jain

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